Exposed: सोनिया-मनमोहन राज में 48 लाख करोड़ का देश का सबसे बड़ा घोटाला! देश की जीडीपी से बड़ा घोटाला आया सामने..

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A few years ago, a story appeared in the Indian press that a massive scam involving the illegal mining and covert export of thorium was taking place in the southern Indian state of Tamil Nadu.

Then, two things happened: one, the story died out quickly without anyone investigating it further (but repeating the allegations over and over again), and two, many just assumed it was true. Given the opacity of the Indian state, particularly in matters involving nuclear materials, there is a tendency for suspicions to become allegations and allegations to become guilty verdicts. In an era of scams, government denials made little difference to the public discourse.

क्या दुनिया की ऊर्जा संबंधी समस्याओं का सबसे बेहतर हल न्यूक्लियर एनर्जी में ही है? इस सवाल के जवाब में मैं यहकहता हूं कि हां यह संभव है, बशर्ते ईंधन बदल लिया जाए। मेरे हिसाब से यह ईंधन थोरियम हो सकता है जिसे मैं सुपरफ्यूल कहता हूं। थोरियम कई जगहों पर भारी मात्रा में उपलब्ध है और इससे एटमी हथियार बनाना आसान नहीं है।लेकिन यह बिजली बनाने वाले एटमी रिएक्टरों में इस्तेमाल हो रहे यूरेनियम की जगह अवश्य ले सकता है और ऐसा हो भी क्यों न, आखिर भारत और चीन जैसे मुल्क भी अब थोरियम आधारित रिएक्टरों की तरफ उम्मीद भरी निगाहों से देख रहे हैं। थोरियम संचालित रिएक्टरों की बात नई नहीं है। पर इनसे चलने वाले रिएक्टर बनाने में दुनिया ने दिलचस्पी नहीं ली।

अब लोगों को, खास तौर से साइंटिस्टों को सोचना चाहिए कि इस वक्त दुनिया को एक ऐसी अफोर्डेबल और सेफ एनर्जी विकल्प की जरूरत है जो यूरेनियम जैसा विध्वंस न हो। इस मामले में थोरियम का कोई जोड़ नहीं है।

रिचर्ड मार्टिन, किताब – सुपर फ्यूल के लेखक के अनुसार…

अब समझ आएगा की क्यों सायना मायनो ने राम सेतु तुडवाने के लिए सर पैर एक किये हुए थे,,

क्यों चीफ कंट्रोलर आफ माईन्स का पद को खाली रखा गया…ये है..

कांग्रेस का नया ”थोरियम घोटाला”, कीमत आप सोच भी नही सकते ४४ लाख करोड… ४८ लाख करोड या ५० लाख करोड या और भी ज्यादा…

भूल जाइये CWG 70 हज़ार करोड

भूल जाइये 2g 176 हज़ार करोड भूल जाइये कोयला घोटाला 18 लाख करोड

आ गये है,, घोटालों के चाचा जान ये है थोरियम महान… ४८ लाख करोड

भारत में दुनिया का लगभग ४४% थोरियम भंडार है ..

समुद्री किनारों से लगभग 44 लाख करोड़ का थोरियम गायब है जिसे काँग्रेसी सरकार ने चोरी करवा के अमेरिका को बेच दिया ये घोटाला राम सेतु से जुड़ा हुआ है जिसका खुलासा शहीद राजीव दीक्षित जी ने किया था अमेरिका और अमेरिकी ऐजेन्ट मनमोहन रामसेतु इसलिये तुड़वाना चाहते हैँ क्योँकि इसके नीचे और आस पास अरबोँ खरबोँ का थोरियम जमा है और ये घोटाला तो सिर्फ बानगी है भारत के पास आज भी अपार खनिज सम्पदा है लेकिन ये नेता लोग छोड़ेँ जब तो. भईया हम तो खूबई कमात है सोनिया डायन खाये जात है.

नियमों का उल्लंघन कर भारत के समुद्र तटो से 2.1 मिलियन टन समुद्री रेत गायब जिसमे था लगभग 195,300 टन थोरियम!

क्या है थोरियम घोटाला?

आरटीआई कार्यकर्ताओं औ देश के १३७ साल पुराने समाचारपत्र स्टेट्समैन ने ४८ लाख करो ड़ के थोरियम खनन घोटाले के बारे में बताया है। लेकिन देश को हुए पूरे नुकसान के बारे में‌ सटीक अनुमान तो कैग जैसी संस्था ही बता सकती है। हमारे देश में मोनाज़ाएट रेत से परमाणु ऊर्जा में आवश्यक तत्व थोरियम को निकालने का काम केवल सरकारी इंडियन रेअर अर्थ लिमिटेड (आईआरईएल) संस्था द्वारा उड़ीसा के छतरपुर, तमिलनाडुअ के मनावलाकुरिची, चवारा और अलुवा और आईआरईएल के औअने कोवलम (केरल) के अनुसण्धान केंद्र में ही किया जाता है। अगर कैग आईआरईएल, औअर देश के परमाणु ऊजा विभाग का औडिट करे तो देश को हुए पूरे नुकसान के बारे में‌ सटीक अनुमान लगाया जा सकता है। स्टेट्समैन अखबार के मुताबिक तो घोटाला ४८ लाख करोड का है जो अब तक के हुए सभी घोटालों की रकम से बीसीयों गुना ज्यादा है।

घोटाले की जड़ में है सरकार का खनन मंत्रालय। देश में खनन का लाइसेंस नागपुर स्थित मुख्य खनन नियंत्रक द्वारा दिये जाते हैं । ३० जून २००८ तक इस पद पर एक ईमानदार अधिकारी श्री सी पी एम्ब्रोस थे । उनके रिटायर होने के बाद अब तक इस पद पर किसी की भी नियुक्ति अभी तक नहीं की गयी है। सेंट्रल ज़ोन के खनन नियंत्रक रंजन सहाय कार्यकारी तौर पर मुख्य खनन नियंत्रक का काम देख रहे है। सहाय के ऊपर नेताओं का वरद हस्त है। उसके खिलाफ़ कई शिकायते सीवीसी के पास पड़ी हैं। खन माफ़िया से मिल कर २००८ के बाद थोरियम जैसे राष्ट्रीय महत्व के खनिज का उत्पादन निजी क्षेत्र को सौंप दिया गया। इस रेत का निर्यात किया जाने लगा जिसे देश से बाहर भेजा जाना ही अपराध है। इस तरह चोरी किये गये खनिज का बाज़ार मूल्य ४८ लाख करोड बैठता है।

आपको ये जानकार आश्चर्य होगा की अपने देश के प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह अमेरिकन एजेंट है, उनके बयानों से तो ये ही लगता हें। मनमोहन ने करुणानिधि और T.R.Balu के साथ मिलकर ये प्लान बनाया है, भगवान श्री राम की सबसे बड़ी निशानी श्री राम सेतु को तोड़ा जाए और उसका मलबा और कचरा अमेरिका को बेचा जाये…

आप लोगो की जानकारी के लिए बता दू, ये मलबा या कचरा नही है, भारतीय वैज्ञानिको का कहना है की इस सेतु ( धनुष-कोटि ) के तल मे 7 तरह के रेडियो एक्टिव एलीमेंट है | जो पूरी दुनिया में सिर्फ़ भारत में ही मिले है। जिसे निकाल कर 150 साल तक बिजली और परमाणु बम्ब बनाये जा सकते हैं । और ये बात भारत के सबसे बड़े वैज्ञानिक और पूर्व राष्ट्रपति डॉ ऐ.पी.जे अबदुल कलाम ने कही थी ।

दोस्तों अमेरिका की नजर इस रेडियो एक्टिव मैटिरियल पर लगी। ये लोग इसे अमेरिका को बेचना चाहते हैं, और जब ये अपने मकसद में कामयाब नही हो पाए तो इन्होने नया तरीका निकाला हें, ये इसे सयुंक्त राष्ट्र संघ की संस्था ”यूनेस्को” की निगरानी में देना चाहते हें, स.रा. संघ में अमेरिकी दादागिरी शायद हर आदमी जानता हें ।ये इसे तोड़ने मे एक बार असफल हो चुके हैं अब ये इनका दुबारा नया प्लान हें। उसे युनेस्को जैसी बाहरी संस्था के हवाले न किया जाए..

क्या है थोरियम?

भविष्य में ऊर्जा संकट की आशंका से पूरी दुनिया जूझ रही है, और डर के इस माहौल में एक बार फिर से थोरियम पॉवर की चर्चा फ़ैशन में आ गई है. इसे भविष्य का परमाणु ईंधन बताया जा रहा है. थोरियम के बारे में वैज्ञानिकों का मानना है कि यूरेनियम की तुलना में यह कहीं ज़्यादा स्वच्छ, सुरक्षित और ‘ग्रीन’ है. और, इन सब आशावादी बयानों में भारत का भविष्य सबसे बेहतर दिखता है क्योंकि दुनिया के ज्ञात थोरियम भंडार का एक चौथाई भारत में है.

अहम सवाल ये है कि अब तक थोरियम के रिएक्टरों का उपयोग क्यों नहीं शुरू हो पाया है, जबकि इस तत्व की खोज हुए पौने दो सौ साल से ऊपर बीत चुके हैं? इसका सर्वमान्य जवाब ये है- थोरियम रिएक्टर के तेज़ विकास के लिए विकसित देशों की सरकारों और वैज्ञानिक संस्थाओं का सहयोग चाहिए, और इसके लिए वे ज़्यादा इच्छुक नहीं हैं. सबको पता है कि यूरेनियम और प्लूटोनियम की ‘सप्लाई लाईन’ पर कुछेक देशों का ही नियंत्रण है, जिसके बल पर वो भारत जैसे बड़े देश पर भी मनमाना शर्तें थोपने में सफल हो जाते हैं. इन देशों को लगता है कि थोरियम आधारित आणविक ऊर्जा हक़ीक़त बनी, तो उनके धंधे में मंदी आ जाएगी, उनकी दादागिरी पर रोक लग सकती है…और भारत जैसा देश परमाणु-वर्ण-व्यवस्था के सवर्णों की पाँत में शामिल हो सकता है.

थोरियम आधारित परमाणु रिएक्टर के विकास में खुल कर अनिच्छा दिखाने वालों में यूरोपीय संघ सबसे आगे है. शायद ऐसा इसलिए कि ज्ञात थोरियम भंडार में नार्वे के अलावा यूरोप के किसी अन्य देश का उल्लेखनीय हिस्सा नहीं है. (वैसे तो, रूस में भी थोरियम का बड़ा भंडार नहीं है, लेकिन वहाँ भविष्य के इस ऊर्जा स्रोत पर रिसर्च जारी है. शायद, थोरियम रिएक्टरों के भावी बाज़ार पर रूस की नज़र है!)

यूरोपीय परमाणु अनुसंधान संगठन(CERN) ने थोरियम ऊर्जा संयंत्र के लिए ज़रूरी एडीएस रिएक्टर(accelerator driven system reactor) के विकास की परियोजना शुरू ज़रूर की थी. लेकिन जब 1999 में एडीएस रिएक्टर का प्रोटोटाइप संभव दिखने लगा तो यूरोपीय संघ ने अचानक इस परियोजना की फ़ंडिंग से हाथ खींच लिया.

यूनीवर्सिटी ऑफ़ बैरगेन के इंस्टीट्यूट ऑफ़ फ़िजिक्स एंड टेक्नोलॉजी के प्रोफ़ेसर एगिल लिलेस्टॉल यूरोप और दुनिया को समझाने की अथक कोशिश करते रहे हैं कि थोरियम भविष्य का ऊर्जा स्रोत है. उनका कहना है कि वायुमंडल में कार्बन के उत्सर्जन को कम करने के लिए ऊर्जा खपत घटाना और सौर एवं पवन ऊर्जा का ज़्यादा-से-ज़्यादा दोहन करना ज़रूरी है, लेकिन ये समस्या का आंशिक समाधान ही है. प्रोफ़ेसर लिलेस्टॉल के अनुसार भविष्य की ऊर्जा सुरक्षा सिर्फ़ परमाणु ऊर्जा ही दे सकती है, और बिना ख़तरे या डर के परमाणु ऊर्जा हासिल करने के लिए थोरियम पर भरोसा करना ही होगा.

उनका कहना है कि थोरियम का भंडार यूरेनियम के मुक़ाबले तीन गुना ज़्यादा है. प्रति इकाई उसमें यूरेनियम से 250 गुना ज़्यादा ऊर्जा है. थोरियम रिएक्टर से प्लूटोनियम नहीं निकलता, इसलिए परमाणु बमों के ग़लत हाथों में पड़ने का भी डर नहीं. इसके अलावा थोरियम रिएक्टर से निकलने वाला कचरा बाक़ी प्रकार के रिएक्टरों के परमाणु कचरे के मुक़ाबले कहीं कम रेडियोधर्मी होता है.

प्रोफ़ेसर एगिल लिलेस्टॉल के बारे में सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि यूरोपीय परमाणु अनुसंधान संगठन की थोरियम रिएक्टर परियोजना में वो उपप्रमुख की हैसियत से शामिल थे. उनका कहना है कि मात्र 55 करोड़ यूरो की लागत पर एक दशक के भीतर थोरियम रिएक्टर का प्रोटोटाइप तैयार किया जा सकता है. लेकिन डर थोरियम युग में भारत जैसे देशों के परमाणु ईंधन सप्लायर बन जाने को लेकर है, सो यूरोपीय संघ के देश थोरियम रिएक्टर के विकास में दिलचस्पी नहीं दिखा रहे.

ख़ुशी की बात है कि भारत अपने बल पर ही थोरियम आधारित परमाणु ऊर्जा के लिए अनुसंधान में भिड़ा हुआ है. भारत की योजना मौजूदा यूरेनियम आधारित रिएक्टरों को हटा कर थोरियम आधारित रिएक्टर लगाने की है. कहने की ज़रूरत नहीं कि भारत को इसमें सफलता ज़रूर ही मिलेगी.

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